उत्तर प्रदेश के निजी स्कूलों में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ ही अभिभावकों की जेब पर पड़ने वाला बोझ एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। लखनऊ सहित कई शहरों में निजी और मिशनरी स्कूल कथित तौर पर अभिभावकों को मनमाने दामों पर किताबें और स्टेशनरी खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं। इस मुद्दे ने तब और जोर पकड़ लिया जब लखनऊ के एक अभिभावक ने एक बुक स्टोर के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराई, आरोप है कि उन्हें स्कूल द्वारा निर्धारित महंगी स्टेशनरी के बिना सिर्फ किताबें देने से इनकार कर दिया गया। यह मामला निजी शिक्षा संस्थानों में बढ़ती व्यावसायिकता और नियमों के उल्लंघन को उजागर करता है, जिससे मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए बच्चों की शिक्षा एक बड़ी चुनौती बन गई है।
मुख्य बिंदु
- कई निजी स्कूल अभिभावकों को विशेष दुकानों से महंगी किताबें और स्टेशनरी खरीदने के लिए बाध्य कर रहे हैं, जिससे खुले बाजार की तुलना में कई गुना अधिक दाम वसूले जा रहे हैं।
- स्कूल नर्सरी से लेकर नौवीं कक्षा तक के छात्रों के लिए पेन, पेंसिल, चॉक और ग्लू जैसे सामान्य स्टेशनरी आइटम के विशिष्ट ब्रांड और कंपनियां तय कर रहे हैं।
- जांच में सामने आया है कि स्कूलों के निर्देश पर बुक स्टोर पर किताबों और कॉपियों के बंडल बनाकर बेचे जा रहे हैं, जिनकी कीमतें ₹7,000 से ₹8,000 तक पहुंच रही हैं।
- लखनऊ में एक अभिभावक ने पीजीआई थाने में शिकायत दर्ज कराई है कि उन्हें स्कूल द्वारा सुझाई गई कॉपियां न खरीदने पर बच्चों की किताबें नहीं दी गईं, जिससे बच्चों की पढ़ाई बाधित हो रही है।
- उत्तर प्रदेश स्व-वित्तपोषित स्वतंत्र विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2018 के तहत स्कूलों द्वारा किताबों और यूनिफॉर्म की जबरन बिक्री पर सख्त पाबंदी है, जिसके उल्लंघन पर भारी जुर्माना और मान्यता रद्द करने का प्रावधान है।
- जिला प्रशासन ने इस मामले का संज्ञान लिया है और जांच के लिए एक उच्च स्तरीय समिति गठित करने की तैयारी में है, जिसमें शिक्षा विभाग और मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारी शामिल होंगे।
अब तक क्या-क्या सामने आया है
अभिभावकों का आरोप है कि नए सत्र की शुरुआत होते ही स्कूलों की मनमानी बढ़ जाती है। किताबों के साथ-साथ महंगी स्टेशनरी खरीदने का दबाव डाला जाता है। उदाहरण के तौर पर, नर्सरी के बच्चों के लिए चॉक की कंपनी (जैसे कोरस और हाई-फाई) और क्रियॉन्स के लिए फेवर कासल या ब्रश के लिए वेल्डन जैसे ब्रांड तय किए जा रहे हैं। कुछ स्कूलों में तो पेंसिल और इरेजर का पूरा बॉक्स सेट में ही थमाया जा रहा है। एक अभिभावक ने बताया कि कक्षा 2 के लिए 20 से अधिक कॉपियां मंगवाई जाती हैं, जिनमें से अधिकांश साल भर अलमारी में ही पड़ी रहती हैं।
अभिभावकों का यह भी कहना है कि स्कूल जानबूझकर विशेष डिजाइन या कस्टमाइज्ड कॉपियां मंगवाते हैं, जो सामान्य दुकानों पर उपलब्ध नहीं होतीं। एक पिता ने बताया कि उनके नौवीं कक्षा के बेटे के लिए कॉपियों का सेट ₹1,400 में मिला, जबकि उन्होंने अपने बड़े बेटे के लिए वही सामान खुले बाजार से 30% छूट पर ₹500 में खरीदा था। यदि कोई अभिभावक केवल किताबें मांगता है, तो अधिकृत दुकानदार सेट के बिना सामान देने से इनकार कर देते हैं।
लखनऊ के वृंदावन सेक्टर-9 स्थित क्लेवर पेस बुक स्टोर से जुड़ा एक ताजा मामला सामने आया है। अभिभावक प्रिंस लेनिन ने शिकायत दर्ज कराई कि जब वे अपने कक्षा 7 और 3 में पढ़ने वाले बच्चों के लिए किताबें लेने पहुंचे, तो स्टोर संचालक ने उन्हें बिना कॉपियों के केवल किताबें देने से मना कर दिया। प्रिंस का कहना है कि उन्होंने अमीनाबाद से आधी कीमत पर बेहतर गुणवत्ता वाली कॉपियां खरीदी थीं, लेकिन स्टोर संचालक ने इसे मानने से इनकार कर दिया। इसके कारण, 24 मार्च से पढ़ाई शुरू होने के बावजूद, उनके बच्चों के पास अब तक किताबें नहीं हैं।
जांच में यह भी पता चला है कि बुक स्टोर पर कक्षा 6 और 7 की किताबों के बंडल ₹7,000 से ₹8,000 से अधिक में बिक रहे थे। एक पतली सी संगीत की किताब भी ₹400 में मिल रही थी। अभिभावकों ने यह भी बताया कि कई निजी स्कूल सीबीएसई के दिशानिर्देशों के बावजूद एनसीईआरटी की किताबों के बजाय निजी प्रकाशकों की महंगी किताबें पढ़ा रहे हैं। वे यह भी आरोप लगाते हैं कि स्कूल हर साल पाठ्यक्रम बदल देते हैं या नई किताबों का सेट लेने का दबाव बनाते हैं, जिससे बड़े भाई-बहनों की किताबों का उपयोग नहीं हो पाता।
संदर्भ और पृष्ठभूमि
यह समस्या केवल कुछ स्कूलों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह निजी शिक्षा क्षेत्र में एक व्यापक चिंता का विषय बन गई है। शिक्षा को एक सेवा के बजाय व्यापार के रूप में देखने की प्रवृत्ति ने अभिभावकों पर अनावश्यक वित्तीय बोझ डाला है। निजी स्कूल अक्सर अपनी आय बढ़ाने के लिए विभिन्न तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, जिनमें किताबों, यूनिफॉर्म और स्टेशनरी की बिक्री से कमीशनखोरी एक प्रमुख तरीका है।
इस मनमानी को रोकने के लिए, उत्तर प्रदेश सरकार ने उत्तर प्रदेश स्व-वित्तपोषित स्वतंत्र विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2018 लागू किया है। इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य निजी स्कूलों की फीस और अन्य शुल्कों में पारदर्शिता लाना और अभिभावकों को शोषण से बचाना है। किताबों और स्कूल एक्सेसरीज से संबंधित इसके प्रमुख प्रावधान निम्नलिखित हैं:
- निर्धारित दुकान से खरीदने की मजबूरी नहीं: अधिनियम की धारा 3 स्पष्ट रूप से कहती है कि कोई भी स्कूल किसी छात्र या अभिभावक को किसी विशेष दुकान या विक्रेता से किताबें, जूते, मोजे या यूनिफॉर्म खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। अभिभावक अपनी सुविधानुसार कहीं से भी इन्हें खरीदने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
- यूनिफॉर्म में बदलाव की सीमा: स्कूलों को अपनी यूनिफॉर्म 5 साल से पहले बदलने की अनुमति नहीं है। यदि कोई बदलाव आवश्यक है, तो इसके लिए जिला शुल्क नियामक समिति (DFRC) से उचित कारण बताकर पूर्व अनुमति लेना अनिवार्य है।
- NCERT किताबों को प्राथमिकता: राज्य सरकार के निर्देशों के अनुसार, स्कूलों में NCERT किताबों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसका उद्देश्य अभिभावकों पर निजी प्रकाशकों की महंगी किताबों का बोझ कम करना है, क्योंकि NCERT की किताबें आमतौर पर सस्ती और गुणवत्तापूर्ण होती हैं।
- शिकायत और जुर्माना: यदि कोई स्कूल इन नियमों का उल्लंघन करता है, तो अभिभावक जिला शुल्क नियामक समिति (DFRC) या जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) के पास शिकायत दर्ज करा सकते हैं। नियमों के उल्लंघन पर स्कूलों पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है:
- पहली बार उल्लंघन पर: ₹1 लाख
- दूसरी बार उल्लंघन पर: ₹5 लाख
- लगातार उल्लंघन पर: स्कूल की मान्यता (recognition) भी रद्द की जा सकती है।
यह अधिनियम अभिभावकों को कानूनी अधिकार प्रदान करता है ताकि वे स्कूलों की मनमानी के खिलाफ आवाज उठा सकें। इस तरह की प्रथाएं न केवल अभिभावकों पर आर्थिक दबाव डालती हैं, बल्कि शिक्षा के माहौल को भी दूषित करती हैं, जहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के बजाय व्यावसायिक हितों को प्राथमिकता दी जाती है।
आगे क्या होगा
इस मामले पर अधिकारियों ने संज्ञान लिया है। अन-एडेड प्राइवेट स्कूल्स के अध्यक्ष अनिल अग्रवाल ने बताया कि जो स्कूल मनमानी कर रहे हैं, उन्हें हिदायत दी गई है और अधिनियम के प्रावधानों को विस्तार से समझाया गया है। उन्होंने कहा कि कई निजी स्कूलों के साथ बैठकें हुई हैं और जल्द ही इस संबंध में कोई निर्णय लिया जाएगा।
वहीं, लखनऊ के जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) राकेश कुमार ने जानकारी दी कि जिलाधिकारी ने इस तरह के मामलों का संज्ञान लिया है। जिलाधिकारी जल्द ही एक समिति गठित करने जा रहे हैं। इस समिति में शिक्षा विभाग के अधिकारियों के साथ-साथ मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारी भी शामिल होंगे। यह समिति अभिभावकों की शिकायतों की गहन जांच करेगी और दोषी पाए जाने वाले स्कूलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करेगी। अभिभावक समुदाय उम्मीद कर रहा है कि यह कदम स्कूलों की मनमानी पर लगाम लगाएगा और बच्चों को उचित मूल्य पर शिक्षा सामग्री उपलब्ध हो पाएगी।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
- प्रश्न: स्कूलों द्वारा किताबों और स्टेशनरी की मनमानी बिक्री क्यों की जाती है?
उत्तर: स्कूलों द्वारा अक्सर निर्धारित विक्रेताओं से कमीशन प्राप्त करने और अभिभावकों को खुले बाजार से सस्ता सामान खरीदने से रोकने के लिए ऐसा किया जाता है। - प्रश्न: क्या किसी विशेष दुकान से किताबें या स्टेशनरी खरीदना कानूनी रूप से अनिवार्य है?
उत्तर: नहीं, उत्तर प्रदेश स्व-वित्तपोषित स्वतंत्र विद्यालय (शुल्क विनियमन) अधिनियम, 2018 के तहत यह स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित है। अभिभावक अपनी सुविधानुसार कहीं से भी खरीद करने के लिए स्वतंत्र हैं। - प्रश्न: अभिभावक इस तरह की मनमानी के खिलाफ कहां शिकायत कर सकते हैं?
उत्तर: अभिभावक जिला शुल्क नियामक समिति (DFRC) या जिला विद्यालय निरीक्षक (DIOS) के कार्यालय में अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। - प्रश्न: नियमों का उल्लंघन करने पर स्कूलों पर क्या कार्रवाई हो सकती है?
उत्तर: पहली बार उल्लंघन पर ₹1 लाख, दूसरी बार पर ₹5 लाख का जुर्माना और लगातार उल्लंघन पर स्कूल की मान्यता रद्द करने तक की कार्रवाई हो सकती है। - प्रश्न: एनसीईआरटी की किताबों को प्राथमिकता क्यों दी जानी चाहिए?
उत्तर: एनसीईआरटी की किताबें आमतौर पर निजी प्रकाशकों की किताबों की तुलना में सस्ती और गुणवत्तापूर्ण होती हैं, जिससे अभिभावकों पर वित्तीय बोझ कम होता है।